Wednesday, June 6, 2012

पखाने का दर्द


मैं तो तुम्हारा ही एक हिस्सा हूं. तुम जो भी देते हो, कमी-बेशी करके वैसा ही निकालने की कोशिश करता हूं. परसों ललका साग दिए थे तो सूद समेत वापस किये थे कि नहीं? हां, ज्यादा तेल मसाला दे देते हो तो उसमें मेरा क्या कसूर? गर्मी होती है उसमें, जल जाता हूं, तब गुस्से में काला निकालता हूं. भाभी उस दिन खूब गोल-गप्पे खाईं, इसमें भी मेरा कसूर है? इंफेक्शन हो गया, मेरा लीवर ही काम करना बंद कर दिया. दू दिन तक एक किनारे रूठ के पड़ा रहा. जो भी उन्होंने दिया मैंने छुआ भी नहीं. सब वैसे ही निकलने दिया, पानी भी. पर तुम मेरा दर्द क्यूं समझो? तुम्हारे ही किसी गलती के कारण जब खुद को एकदमे कड़ा कर देता हूं, तुम्हें तो सिर्फ वो दर्द याद रहता है न?  
 
तुम हगे पे हगते हो, मूते पे मूतते हो, मुझे दुर्गंध में छोड़ जाते हो. क्या मुझे तकलीफ नहीं होती? क्या मैं तुम्हारे लिए इतना त्याज्य हो गया? दो-चार दिनों के लिए अगर मैं तुम्हें त्याग दूं तो? कभी सोचा है क्या बीतेगी तुम पे और तुम्हारे पादने से समाज पे? तुम्हारी जग-हंसाई हो जाएगी. इसीलिए मैंने कभी भी खुद को तुमसे जुदा नहीं किया. तुम लाख जोर लगाते हो, मेरे निकलने पर प्रफुल्लित हो जाते हो फिर भी मैं कहीं न कहीं तुममें मौजूद रहता हूं. तुम्हारे लिए मेरा यह प्यार निःस्वार्थ है. इसके बदले मैंने तुमसे कुछ भी नहीं मांगा. फिर तुम क्यूं इतने निष्ठुर हो रहे हो? क्यूं मेरी तरक्की पर जल-भून रहे हो? क्यूं मेरी तरक्की को राष्ट्रीय विवाद बनाने पे तुले हुए हो?

मेरी भी इज्जत है. मैं भी अपने समाज में सर उठा के चलना चाहता हूं. पर तुम्हें क्या? जब चाहा, जैसे चाहा, जहां चाहा, मुझे निकाल देते हो. तनिक भी दया नहीं आती तुम्हें मुझपे? जब सूअर, कुत्ते, चील-कौए मुझे नोंच-नोंच के खा रहे होते हैं, क्या तुम्हारा हृदय द्रवित नहीं होता? क्या तुम नहीं चाहते कि मेरा भी एक घर हो? अगर है तो उससे भी अच्छा हो? खुद तो अपनी अय्याशी के लिए हमेशा कुछ न कुछ खरीदते रहते हो, मैंने कभी शिकायत की? लेकिन आज चुप नहीं बैठूंगा. और न ही अपने समाज को बैठने दूंगा. अब हममें भी चेतना आ गयी है. तुम्हारा ब्राह्मणवादी रवैया अब बर्दास्त नहीं. नव भारत का निर्माण अब गुह सम्मान के साथ ही होगा.

साफ-सुथरी और सुगंधित जगह हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है. और हम ऐसे ही जगह पे निकलेंगे. योजना आयोग तो एक बहाना है, पूरे देश में ऐसे ही पखाने बनाना है. जय हिंद.... जय भारत.... जय पाखाना.....

Wednesday, March 7, 2012

होली और कल्लू मिसिर


अरे मेरे माईक के ऊपर आप अपना काहे रख रहे........ ओफ्फो सामने से फोटो जर्नलिस्ट को हटाओ...... I have never seen such a huge fan following of a simple man…… कृप्या सब शांत हो जाईए ....... लगता है आने वाले हैं....... फगुआ पर तोहरा सब के औ पूरा देश-दुनिया के हमर अश्लील प्रणाम. पुच्छह का पूछना है.

बीबी-सीं(ह): कल्लू जी आप होली के जनार्दन जांगड उर्फ रॉकस्टार बन चुके हैं. पर यह सुनने में आया है कि आप होली को पर्व नहीं मानते हैं, ऐसा क्यूं?
कल्लू मिसिर: होली और परब? बौराहा तहिने.... अरे ई तो सिंपल शरीर सफाई का दिन है. सौ-सवा सौ दिन के बाद नहाये के दिन है, पूरा कादो-कीचड़-रंग-गोबर में बोरा के रगड़-रगड़ के नहाये के दिन है. आप लोग ऑफिस जाय वाला लोग जड़वा में दूय मग पानी-डियोडरेंट से नहाते हैं कि नहीं? त काहे परब-त्यौहार के पिच्छू पिल के पड़ गए हैं, जाईए शरीर साफ कीजिए. 

आज(म) तक-से: मिसिर जी, आप पर होली में छेड़छाड़ और अभद्र व्यवहार का आरोप लगता रहा है, इसे आप कैसे देखते हैं?
कल्लू मिसिर: राष्टहित के काम में फांसी के फंदे पे भी चढ़ने से नहीं डरूंगा. महिलाओं के मन से डर और झिझक निकालने के लिए मैं छेड़छाड़ करता हूं. होली ही एकमात्र दिन है जब महिलाएं पलटवार करती हैं, जोर-जबरदस्ती करती हैं, मेरा प्रयास सिर्फ इतना होता है कि वे सब शर्म-हया छोड़कर हर दिन यह साहस करें. इसमें बुराई क्या है?

ईटीवी(रप्पन): मिसिर बबा, कपड़ा-फाड़ होली खेलकर क्या आप समाज को शर्मशार नहीं करते? 
कल्लू मिसिर: नहीं, बिल्कुल्ले नहीं. हमारे समाज में अंग विशेष संबंधी संकुचित मानसिकता घर कर गई है. मैं मानव शरीर को इंसान के रूप में देखता हूं, लिंग-भेद को खतम करने का आखिरी रास्ता कपड़ा-फाड़ होली ही हो सकता है. इसीलिए मैं औरत-मरद का भेद नहीं करता, बस फाड़ डालता हूं......

Al jazz-era: Mr. Mi-Sir, whats Your stand on use of alcohol, hashish in Holi? Isn’t it illegal? 
Kallu Mi-Sir: Mr. Zeera, legal and illegal is about perspective. I might differ with You, but Communal and Caste hatred can only be solved through use of what You called illegal. You must have to go and see the brotherhood where these so called illegal things are sold and served. 

एनडीटी-वा(री): कल्लू जी, सभी मुद्दों पर आपने बड़ी चतुराई से अपना बचाव किया है, लेकिन होली में बदहजमी की सीमा तक खाने को आप क्यूं प्रोत्साहन देते हैं?
कल्लू मिसिर: जैसा मैंने पहले भी बताया, मैं अंग-विशेष को प्राथमिकता नहीं देता. बाहरी-भीतरी सभी अंगों को मैं समान नजरिये से देखता हूं. नहाकर सिर्फ बाहरी अंगों को साफ किया जा सकता है, परंतु भीतरी अंगों का क्या? उनके साफ-सफाई के लिए, होली के दिन हम सभी को कंठ तक ठूंस कर खाना चाहिए. इससे अगले दो-चार दिनों में हमारे पेट के सभी वकार (ठोस-द्रव-गैस) बाहर निकल जाते हैं. 
बस बहुत हुआ. जाईए सब मौगा-मरद फगुआ खेलिए........